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हाशिमपुरा कांड में 30 साल बाद 16 वर्दी वालों को उम्र कैद

  • [By: FPIndia || Published: Oct 31, 2018 14:17 PM IST
हाशिमपुरा कांड में 30 साल बाद 16 वर्दी वालों को उम्र कैद
New Delhi/Meerut: मेरठ के बहुचर्चित हाशिमपुरा कांड के पीड़ित अब इंसाफ से महरूम नहीं हैं। पैरवी का लचीलापन ऐसा रहा कि 30 साल बाद उन्हें न्याय मिल सका। दिल्ली हाईकोर्ट ने पीएसी के 16 जवानों को 22 मई, 1987 को मेरठ दंगे के दौरान हुए इस कांड में नरसंहार का दोषी मानते हुए उनके हक में उम्र कैद की सजा मुकर्रर कर दी। आरोपियों पर जुर्माना भी लगा है। इससे पहले 42 लोगों की मौत पर दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने साल 2015 में फैसला देकर सभी 16 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। खास बात यह कि यह सबसे पुराने पेंडिंग केस में से एक था और कुल 19 आरोपी थे जिनमें से 3 आरोपियों की मौत फैसले से पहले ही हो गई। इस कांड में जिन्होंने अपनों को खोया उनकी आँखों में हमेशा इंसाफ की तड़प दिखती रही। इंसाफ की उम्मीद में कई लोग बूढ़े हुए, तो कुछ दुनिया को अलविदा कह गए। मामले में पैरवी करने वाले मौलाना यामीन भी अब इस दुनिया में नहीं हैं। 
1987 में ऐसे हुआ था सामूहिक नरसंहार
1987 के दंगों की शुरूआत शब्बेरात पर अनार चलाने के विवाद को लेकर हुई। हिन्दू-मुस्लिम आमने-सामने आ गए और हाहाकार मच गया। मजबूरन शहर कर्फ्यू के हवाले कर दिया गया। आरोपित है कि तलाशी अभियान के दौरान 41वीं वाहिनी पीएसी के जवान ट्रक में भरकर युवाओं को ले गए ओर मुरादनगर नहर पर ले जाकर गोलियों से भून दिया। उनकी लाशें नहर में फेंक दी गईं। कुछ लोग मुरादनगर से बचकर वापस भाग आये थे। उस्मान, जुल्फिकार व दो अन्य के पैरों में गोलियां लगी थीं। गाजियाबाद के तत्कालीन एसएसपी विभूति नारायण राय ने मुकदमें लिखाये। इस दंगे में जैनुद्दीन ने अपने दो जवान बेटों को खोया। उन दिनों मेरठ के जिलाधिकारी राधेश्याम कौशिक व एसएसपी मैनेजर पाण्डेय थे जिन्हें बाद में हटा दिया गया था। केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। 
नेताओं ने जमकर भुनाया पीड़ितों का दर्द
हाशिमपुरा कांड के बाद सियासत करने वालों ने दंगा पीड़ितों के दर्द को खूब भुनाया। हाशिमपुरा व मलियाना कांड के बाद कई ऐसे नेता रहे जो गला फाड़कर चिल्लाते रहे और पीड़ितों को न्याय दिलाने के ताल ठोकते रहे परन्तु उनके दावे थोथे ही साबित हुए, क्योंकि दावों के मुताबिक उन्होंने कुछ नहीं किया। स्थानीय नेता भी वक्ती तौर पर नब्ज छूते रहे ओर वोट पाते रहे।

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