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बिना टांगों के कर्तव्य निभाता इंस्पेक्टर, अपाहिज होकर भी नहीं खोया हौंसला

  • [By: FPIndia || Published: May 16, 2018 23:51 PM IST
 बिना टांगों के कर्तव्य निभाता इंस्पेक्टर, अपाहिज होकर भी नहीं खोया हौंसला
Chandigarh, (Panjab): किसी इंसान के दोनों पैर हादसे में हमेशा के लिए कट जाएं, तो जिंदगी यकीनन जीते जी मौत जैसी ही हो जाती है, लेकिन पुलिस इंस्पेक्टर रामदयाल की कहानी बिल्कुल जुदा है। विकलांग होकर भी उन्होंने अपनी हिम्मत व हौंसले को नहीं खोया और मुसीबतों से जूझते हुए पॉजिटिव सोच के दम पर जिंदगी को पटरी पर ले आए। उनके दोनों पैर नहीं है, लेकिन वह पूरी जिम्मेदारी से अपने कर्तव्यों का खुशी से पालन करते हैं। उनका गजब का आत्मविश्वास उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है जो कठिनाईयों के सामने जिंदगी की जंग हार जाते हैं। उन्होंने साबित कर दिखाया कि जिंदगी बोझ नहीं होती, बल्कि इंसान को उसे जीने का तरीका आना चाहिए। खास बात यह है कि बचपन से गरीबी देखकर बड़े हुए इस शख्स ने मजदूरी करके पढ़ाई की और लोगों की सेवा का पेशा चुना। बीबीसी ने भी इंस्पेक्टर की कहानी को स्पेशल कहानी के तौर पर लिया।    
    राम दयाल भारतीय पुलिस के उन अधिकारियों में शामिल हैं जिनकी बिना टांगों के अपने कर्तव्यों का निर्वाहन पूरी मुस्तैदी से कर रहे हैं। चंडीगढ़ में थाना इंचार्ज के रूप में काम कर चुके राम दयाल शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों को पकड़ने के लिए अभियान चलाने समेत कई ऑपरेशंस को अंजाम दे चुके हैं। वर्तमान में वह चंडीगढ़ पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी हैं। अपनी ड्यूटी को लेकर वह मुस्तैद रहते हैं। उनके हौंसलों को हर कोई सराहता है। राम दयाल का पुश्तैनी गांव हुकड़ां होशियारपुर जिले में है। उन्होंने अपना बचपन गरीबी में बिताया। रिक्शा चलाया और अपने बड़े भाइयों के साथ अनाज मंडी में मजदूरी की। पढ़ाई को लेकर उनमें जुनून था। गरीबी और ग्रामीण जीवन की दुश्वारियों से संघर्ष करते हुए वह कॉलेज पहुंचे और एक बेहतरीन एथलीट बन गए। पढ़ाई और खेलों में उपलब्धियों की बदौलत ही वह चंडीगढ़ पुलिस में असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर के पद पर भर्ती हुए थे। बाद में उन्हें परमोशन भी मिला।
हादसे में बोझिल हुई जिंदगी में खुद को संभाला
कई साल पहले राम दयाल सयुंक्त राष्ट्र की ओर शांति सेना में शामिल होकर कोसोवो में डेप्यूटेशन पर गए। इसी दौरान वह छुट्टियों में घूमने के लिए जर्मनी गए और वहां प्लेटफॉर्म पर गाड़ी का इंतजार करते समय एक रेल हादसे का शिकार हो गए। इस दर्दनाक हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी को बदल दिया। यह बताते-बताते राम दयाल अजीब से दर्द की गहराई में डूब जाते हैं और फिर संभल कर आगे बोलते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि मेरे साथ क्या हुआ, मैं कई हफ्ते कोमा में रहा। जब होश आया तो अपने पांव पर खड़ा होने लायक नहीं था। मेरे दोनों पांव काटे जा चुके थे। पसलियां टूट चुकी थीं और एक आंख भी खराब हो गई थी। आंखों व सिर के कई ऑपरेशन किए गए थे।’ अब वह कृत्रिम पैरों के जरिए ही चल पाते हैं।
दूसरों के लिए शुरू किया जिंदगी जीना
राम दयाल बताते हैं कि ‘यह मेरी जिंदगी के सबसे मुश्किल दिन थे। जिंदगी से मौत बेहतर लगने लगी। आत्महत्या के ख्याल आते थे। बिस्तर पर पड़े-पड़े और व्हील चेयर में बैठे हुए जिंदगी धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।’ वह आगे बताते हैं, ‘मेरे भाइयों और परिवार ने मुझे जीने का मकसद दिया, मुझे समझ में आया कि अगर मुझे अपने दुख से उबरना है तो दूसरों के लिए जीना सीखना होगा।’ राम दयाल ने अपने तीनों भाइयों के साथ मिलकर पैसे इकट्ठे किए और गांव के बच्चों की सेवा का काम शुरू किया। ऐसे बच्चों जिनके पास पढ़ने लिखने की सुविधा नहीं थी, उनको किताबें और कॉपियां, यूनिफॉर्म बांटी गईं। इसके साथ ही जवाहर नवोदय विद्यालय में दाखिला करवाने के लिए कोचिंग दी गई। अब उनका यह मिशन छह जिलों में चल रहा है। राम दयाल कहते हैं, ‘मैं पढ़ा-लिखा था और मेरे पास रोजगार था, इसी वजह से मैं निराशा से निकल पाया। उन लोगों के बारे में सोचिए जो खेतों में काम करते हुए विकलांग हो जाते हैं, उनकी जिंदगी कितनी बदतर हो जाती है। वह कहते हैं कि दूसरों के लिए जीना एक अलग अनुभव है।
स्रोतः बीबीसी

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