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साहित्य के चंद्रमा महाकवि नीरज को याद करेगी दुनिया

  • [By: FPIndia || Published: Jul 20, 2018 20:08 PM IST
साहित्य के चंद्रमा महाकवि नीरज को याद करेगी दुनिया
New Delhi: जिनकी जिंदगी में सरलता हो और व्यक्तित्व आत्मीयता से परिपूर्ण हो उन्हें भुलाना किसी के लिए भी नामुमकिन होता है। पद्मभूषण प्रख्यात महाकवि व गीतकार गोपालदास नीरज हिंदी की ऐसी ही वीणा थे। वह मर्म को शब्दों में ढालने के हुनर के वह बाजीगर थे। दर्द और प्रेम की अभिव्यक्ति एक साथ सामने लाते थे। गीतों की दुनिया के राजकुमार ने 93 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया और वह कभी न आने वाले सफर पर निकल गए। उनका जाना साहित्य जगत की बहुत बड़ी क्षति है। उनके बिना मंच सूने होंगे, लेकिन अपने चाहने वालों के दिलों में वह हमेशा जिंदा रहेंगे। 
     साहित्य जगत के लोग 19 जुलाई, 2018 को शायद ही कभी भुला सकें। यही वह तारीख रही जब गीतों के राजकुमार ने अंतिम सांस ली। महाकवि व गीतकार गोपालदास नीरज का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। उन्हें संक्रमण के चलते आगरा से लाकर भर्ती कराया गया था। उनकी हालत नाजुक थी और वह आइसीयू में भर्ती थे। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। गोपालदास नीरज सरलता की मिसाल थे। उनकी कलम ने अनगिनत कविताओं, गीतों, गजलों और किताबों को जन्म दिया। वर्ष 1991 में उन्हें पद्मश्री जबकि वर्ष 2007 में पद्मभूषण से नवाजा गया। उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म गीतकार का भी सम्मान मिला। इसके अलावा एक अनेकों सम्मान उन्हें दिए गए। उनकी ख्वाहिश मरकर भी जिंदा रहने की रही इसलिए उन्होंने वर्ष 2015 में उन्होंने अपना शरीर जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया था। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा कि श्री नीरज की अनूठी शैली की वजह से ही वह सभी पीढ़ियों के बीच प्रसिद्व थे। उनके कार्य अविस्मरणी हैं। 
महाकवि गोपालदास नीरज के जीवन से जुड़ी खास बातें
- महाकवि गोपालदास नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के कुरावली गांव में हुआ था। चार भाइयो में वह दूसरे नंबर पर थे। 
-1960 के दशक में गोपालदास नीरज का गीत कारवां गुजर गया प्रसारित हुआ, तो लोग उन्हें जानने लगे। इसके बाद उन्होंने अन्य फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। बॉलीवुड से उन्हें ऑफर मिलने शुरू हो गए। वह गीतकार के रूप में मशहूर हो गए।
-महाकवि गोपालदास नीरज की जिंदगी पिता की मौत के बाद मुफलिसी में गुजरी। नीरज और उनके परिवार के सामने जिंदगी जीने का संकट था। उनके एक रिश्तेदार महीने में उन्हें 5 रूपये की मदद किया करते थे। उससे तीन भाइयों व अन्य का खर्च चलता था। साल 1938 की बात थीं यह।
-गोपालदास नीरज ने साल 1942 में कोलकाता में पड़े अकाल के दौरान निःशुल्क काव्यपाठ किया। उससे मिली राशि को उन्होंने पीड़ितों की सहायता के लिए दान कर दिया था। 
-गोपालदास नीरज पहली बार काव्यपाठ करने के पांच रूपये मिले थे।
-महाकवि का एक बार डाकुओं से भी पाला पड़ा। दरअसल वह इटावा में काव्यपाठ करके जीप से जंगल के रास्ते वापस जा रहे थे तभी रास्ते में डाकुओं ने उनकी जीप को घेर लिया। डाकुओं के सरदार को उन्होंने बताया कि वह कवि हैं, लेकिन सरदार ने कहा कि वह कुछ सुनाएं, तो मानेंगे कि कवि हैं। इसके बाद उन्होंने डाकुओं को भजन सुनाए। डाकुओं के सरदार ने खुश होकर उन्हें सौ का नोट देकर रवाना किया। 
-वह अपनी जिंदगी के जुड़े दिलचस्प किस्से खुद ही सुनाया करते थे। उन्होंने एक बार मंच से बताया कि बॉलीवुड के एक मशहूर संगीतकार ने उनसे दो गाने लिखवाए। इसके बदले उन्हें चेक मिला, लेकिन वह चेक बाउंस हो गया।

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